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mahabharat 12.121.9-10h: महाराज! धर्म का दूसरा नाम आचरण है। संसार में सदैव सावधान रहने वाले मनुष्य का धर्म किसी भी प्रकार नष्ट न हो, इसीलिए दण्ड आवश्यक है और यही उस आचरण का व्यावहारिक स्वरूप है। ॥9 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.121: दण्डके स्वरूप, नाम, लक्षण, प्रभाव और प्रयोगका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 121: दण्डके स्वरूप, नाम, लक्षण, प्रभाव और प्रयोगका वर्णन  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  12.121.9-10h 
धर्मस्याख्या महाराज व्यवहार इतीष्यते।
तस्य लोप: कथं न स्याल्लोकेष्ववहितात्मन:॥ ९॥
इत्येवं व्यवहारस्य व्यवहारत्वमिष्यते।
 
 
अनुवाद
महाराज! धर्म का दूसरा नाम आचरण है। संसार में सदैव सावधान रहने वाले मनुष्य का धर्म किसी भी प्रकार नष्ट न हो, इसीलिए दण्ड आवश्यक है और यही उस आचरण का व्यावहारिक स्वरूप है। ॥9 1/2॥
 
Maharaj! Another name for Dharma is behavior. The Dharma of a man who is always cautious in the world should not be lost in any way, that is why punishment is necessary and this is the practical nature of that behavior. ॥9 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)