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mahabharat 12.121.53: यद्यपि वह दण्ड स्वामी की मान्यता के आधार पर देखा गया है, तथापि उसे भी अभ्यास का ही एक रूप माना गया है। जिसे अभ्यास माना गया है, वह भी वेदों में वर्णित विषय से भिन्न नहीं है ॥53॥   |   mahabharat अध्याय 12.121: दण्डके स्वरूप, नाम, लक्षण, प्रभाव और प्रयोगका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 121: दण्डके स्वरूप, नाम, लक्षण, प्रभाव और प्रयोगका वर्णन  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  12.121.53 
दण्ड: प्रत्ययदृष्टोऽपि व्यवहारात्मक: स्मृत:।
व्यवहार: स्मृतो यश्च स वेदविषयात्मक:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि वह दण्ड स्वामी की मान्यता के आधार पर देखा गया है, तथापि उसे भी अभ्यास का ही एक रूप माना गया है। जिसे अभ्यास माना गया है, वह भी वेदों में वर्णित विषय से भिन्न नहीं है ॥53॥
 
Although that punishment has been seen on the basis of the belief of the Swami, yet it has also been considered as a form of practice. What has been considered as practice is also not different from the subject mentioned in the Vedas. ॥ 53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)