श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 120: राजधर्मका साररूपमें वर्णन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.120.6 
यस्मिन्नर्थे हितं यत् स्यात् तद्वर्णं रूपमादिशेत्।
बहुरूपस्य राज्ञो हि सूक्ष्मोऽप्यर्थो न सीदति॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जो रूप किसी कार्य के लिए लाभदायक हो, उसे वही रूप धारण करना चाहिए (जैसे, अपराधी को दण्ड देते समय भयंकर रूप धारण करना चाहिए और दीन-दुखियों पर दया करते समय शान्त एवं करुणामय रूप धारण करना चाहिए) इस प्रकार जो राजा अनेक रूप धारण करता है, उसका छोटा-सा कार्य भी कभी नहीं बिगड़ता॥6॥
 
Whatever form is beneficial for a particular task, he should assume that form (for example, while punishing a criminal, he should assume a fierce form and while showing mercy to the poor, he should assume a calm and compassionate form). In this way, the king who assumes many forms, even his smallest task does not go wrong.॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)