एतान् मयोक्ताश्चर राजधर्मान्
नॄणां च गुप्तौ मतिमादधत्स्व।
अवाप्स्यसे पुण्यफलं सुखेन
सर्वो हि लोको नृप धर्ममूल:॥ ५६॥
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! मेरे द्वारा बताए गए इन राजधर्मों का पालन करो और प्रजापालन में मन लगाओ। ऐसा करने से तुम्हें सुखपूर्वक पुण्य का फल प्राप्त होगा; क्योंकि समस्त जगत का मूल धर्म ही है। 56।
O lord of men! Follow these royal duties as told by me and concentrate on taking care of the people. By doing this you will happily attain the fruits of virtue; because the root of the whole world is Dharma. 56.
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि राजधर्मकथने विंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें राजधर्मका वर्णनविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२०॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥