श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 120: राजधर्मका साररूपमें वर्णन  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  12.120.46 
यत्रासते मतिमन्तो मनस्विन:
शक्रो विष्णुर्यत्र सरस्वती च।
वसन्ति भूतानि च यत्र नित्यं
तस्माद् विद्वान् नावमन्येत देहम्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
अतः जहाँ बुद्धिमान और मनस्वी महर्षि इन्द्रियों में निवास करते हैं, जिसमें इन्द्र, विष्णु और सरस्वती इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता के रूप में निवास करते हैं और जिसके भीतर समस्त जीव सदैव निवास करते हैं, अर्थात् जो शरीर समस्त जीवों के पोषण का आधार है, उस मानव शरीर की विद्वान पुरुष को उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
 
Therefore, where the intelligent and mindful Maharshi resides in the sense organs,* in which Indra, Vishnu and Saraswati reside as the presiding deities of the senses and within which all living beings always reside, that is, the body which is the basis for the sustenance of all living beings, a learned man should not ignore that human body.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)