श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 120: राजधर्मका साररूपमें वर्णन  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  12.120.45 
विद्या तपो वा विपुलं धनं वा
सर्वं ह्येतद् व्यवसायेन शक्यम्।
बुद्धॺायत्तं तन्निवसेद् देहवत्सु
तस्माद् विद्याद् व्यवसायं प्रभूतम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
ज्ञान, तप और प्रचुर धन - ये सब परिश्रम से प्राप्त होते हैं । वह परिश्रम प्राणियों में बुद्धि पर निर्भर है; अतः सभी कार्यों की सिद्धि के लिए परिश्रम को ही पर्याप्त साधन समझना चाहिए ॥ 45॥
 
Knowledge, penance and abundant wealth - all these can be obtained through hard work. That hard work is dependent on the intellect in living beings; hence hard work should be considered as the sufficient means for the accomplishment of all tasks. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)