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mahabharat 12.120.41: हानि, लाभ, रक्षा और संचय को तथा परस्पर संबंधित धन और भोग को भी जानकर बुद्धिमान राजा को शत्रु के साथ संधि या युद्ध करना चाहिए; इस विषय पर विचार करने के लिए उसे बुद्धिमान पुरुषों की सहायता लेनी चाहिए॥ 41॥   |   mahabharat अध्याय 12.120: राजधर्मका साररूपमें वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 120: राजधर्मका साररूपमें वर्णन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  12.120.41 
क्षयं वृद्धिं पालनं संचयं वा
बुद्‍ध्वाप्युभौ संहतौ सर्वकामौ।
ततश्चान्यन्मतिमान् संदधीत
तस्माद् राजा बुद्धिमत्तां श्रयेत॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
हानि, लाभ, रक्षा और संचय को तथा परस्पर संबंधित धन और भोग को भी जानकर बुद्धिमान राजा को शत्रु के साथ संधि या युद्ध करना चाहिए; इस विषय पर विचार करने के लिए उसे बुद्धिमान पुरुषों की सहायता लेनी चाहिए॥ 41॥
 
After knowing the loss, gain, protection and accumulation, and also after knowing the mutually related wealth and enjoyment, a wise king should enter into a treaty or war with the enemy; for deliberating on this matter, he should take the help of wise men.॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)