श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 120: राजधर्मका साररूपमें वर्णन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  12.120.40 
हरेत कीर्तिं धर्ममस्योपरुन्ध्या-
दर्थे दीर्घं वीर्यमस्योपहन्यात्।
रिपुर्द्वेष्टा दुर्बलो वा बली वा
तस्माच्छत्रोर्नैव हीयेद् यतात्मा॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
द्वेषी शत्रु, चाहे बलवान हो या दुर्बल, राजा की कीर्ति को नष्ट कर देता है, उसके धर्म-कर्म में बाधा डालता है और उसकी बढ़ी हुई धन कमाने की शक्ति को नष्ट कर देता है; इसलिए मन को वश में रखने वाले राजा को चाहिए कि वह शत्रुओं के प्रति प्रमाद न करे ॥40॥
 
A hateful enemy, whether strong or weak, ruins the reputation of a king, obstructs his religious duties and destroys his increased power to earn money; therefore a king who controls his mind should not be careless towards his enemies. ॥ 40॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)