श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 120: राजधर्मका साररूपमें वर्णन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.120.4 
यथा बर्हाणि चित्राणि बिभर्ति भुजगाशन:।
तथा बहुविधं राजा रूपं कुर्वीत धर्मवित्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जैसे साँपों को खाने वाला मोर नाना प्रकार के पंख धारण कर लेता है, वैसे ही धर्म को जानने वाले राजा को समय-समय पर नाना प्रकार के रूप धारण करने चाहिए। ॥4॥
 
Just as a peacock that eats snakes adopts various kinds of feathers, so a king who knows the Dharma should, from time to time, manifest various forms of himself. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)