Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.120.30: जिसका हर्ष और क्रोध कभी व्यर्थ नहीं होता, जो स्वयं ही सब कार्यों का ध्यान रखता है और जिसका धन आत्मविश्वास है, उसके लिए पृथ्वी ही धन का स्रोत बन जाती है ॥30॥ | mahabharat अध्याय 12.120: राजधर्मका साररूपमें वर्णन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अमोघक्रोधहर्षस्य स्वयं कृत्यान्ववेक्षितु:।
आत्मप्रत्ययकोशस्य वसुदैव वसुन्धरा॥ ३०॥
अनुवाद
जिसका हर्ष और क्रोध कभी व्यर्थ नहीं होता, जो स्वयं ही सब कार्यों का ध्यान रखता है और जिसका धन आत्मविश्वास है, उसके लिए पृथ्वी ही धन का स्रोत बन जाती है ॥30॥
For a king whose joy and anger are never in vain, who personally looks after all affairs and whose treasure is self-confidence, the very earth becomes a source of wealth. ॥ 30॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥