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mahabharat 12.118.6: परंतु नीच जाति का व्यक्ति गुणवान राजा का आश्रय पाकर दुर्लभ सुख भोगता है, फिर भी यदि राजा एक बार भी उसकी निन्दा कर दे तो वह उसका शत्रु हो जाता है ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 12.118: राजाके सेवक, सचिव तथा सेनापति आदि और राजाके उत्तम गुणोंका वर्णन एवं उनसे लाभ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 118: राजाके सेवक, सचिव तथा सेनापति आदि और राजाके उत्तम गुणोंका वर्णन एवं उनसे लाभ  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.118.6 
अकुलीनस्तु पुरुष: प्राकृत: साधुसंश्रयात्।
दुर्लभैश्वर्यतां प्राप्तो निन्दित: शत्रुतां व्रजेत्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
परंतु नीच जाति का व्यक्ति गुणवान राजा का आश्रय पाकर दुर्लभ सुख भोगता है, फिर भी यदि राजा एक बार भी उसकी निन्दा कर दे तो वह उसका शत्रु हो जाता है ॥6॥
 
But a person of low caste enjoys rare luxuries after getting the patronage of a virtuous king, yet if the king criticizes him even once, he becomes his enemy. 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)