श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 118: राजाके सेवक, सचिव तथा सेनापति आदि और राजाके उत्तम गुणोंका वर्णन एवं उनसे लाभ  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  12.118.23-24 
राजा गुणशताकीर्ण एष्टव्यस्तादृशो भवेत्।
योधाश्चैव मनुष्येन्द्र सर्वे गुणगणैर्वृता:॥ २३॥
अन्वेष्टव्या: सुपुरुषा: सहाया राज्यधारणे।
न विमानयितव्यास्ते राज्ञा वृद्धिमभीप्सता॥ २४॥
 
 
अनुवाद
ऐसे सैकड़ों गुणों से युक्त राजा ही अपनी प्रजा के लिए वांछनीय है। हे नरेन्द्र! राज्य की रक्षा में सहायक सभी सैनिकों को भी ऐसे ही उत्तम गुणों से युक्त होना चाहिए। इस कार्य के लिए केवल सत्पुरुषों की ही आवश्यकता होनी चाहिए और जो राजा अपनी उन्नति चाहता है, उसे अपने सैनिकों का कभी अपमान नहीं करना चाहिए।॥ 23-24॥
 
Only a king endowed with hundreds of such qualities is desirable for his subjects. O Narendra! All the soldiers who help in the defence of the kingdom should also be endowed with such excellent qualities. Only good men should be sought for this task and a king who desires his own progress should never insult his soldiers.॥ 23-24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)