श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 118: राजाके सेवक, सचिव तथा सेनापति आदि और राजाके उत्तम गुणोंका वर्णन एवं उनसे लाभ  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.118.22 
युक्तदण्डो न निर्दण्डो धर्मकार्यानुशासन:।
चारनेत्र: प्रजावेक्षी धर्मार्थकुशल: सदा॥ २२॥
 
 
अनुवाद
वह न्यायपूर्वक दण्ड दे, दण्ड का कभी परित्याग न करे, धर्म का उपदेश दे, गुप्तचरों की सहायता से राज्य की देखभाल करे, प्रजा पर दया दृष्टि रखे तथा सदैव धन और धर्म के उपार्जन में तत्पर रहे।
 
He should give just punishments, never forsake punishment, preach dharma, look after the kingdom with the help of spy eyes, have a kind eye on the subjects and always remain skillfully engaged in earning wealth and dharma. 22.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)