श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 118: राजाके सेवक, सचिव तथा सेनापति आदि और राजाके उत्तम गुणोंका वर्णन एवं उनसे लाभ  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  12.118.2-3 
एवं राज्ञा मतिमता विदित्वा सत्यशौचताम्।
आर्जवं प्रकृतिं सत्यं श्रुतं वृत्तं कुलं दमम्॥ २॥
अनुक्रोशं बलं वीर्यं प्रभावं प्रश्रयं क्षमाम्।
भृत्या ये यत्र योग्या: स्युस्तत्र स्थाप्या: सुरक्षिता:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार बुद्धिमान राजा को चाहिए कि वह पहले अपने सेवकोंकी सत्यता, पवित्रता, सरलता, स्वभाव, शास्त्रज्ञान, सदाचार, कुलीनता, संयम, दया, बल, पराक्रम, प्रभाव, नम्रता और क्षमाशीलताका ज्ञान कर ले और फिर उन्हें उनकी योग्यताके अनुसार किसी विशेष कार्यमें नियुक्त करके उनकी रक्षाका पूर्ण प्रबंध करे॥ 2-3॥
 
Similarly, a wise king should first find out about the truthfulness, purity, simplicity, nature, knowledge of scriptures, good conduct, nobility, self-control, kindness, strength, valour, influence, humility and forgiveness of his servants and then employ them for a particular task as per their capability and make full arrangements for their protection.॥ 2-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)