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mahabharat 12.117.d5-d7: यदि वह चाहे तो पक्षियों को भी गरुड़ का बल दे सकता है। अतः जब तक वह किसी अन्य जीव पर प्रसन्न या संतुष्ट होकर दया करके उसे भी वैसा ही बल न दे, मैं शीघ्र ही इस ब्रह्मर्षिक का वध कर दूँगा। ऋषि के वध के पश्चात् मैं यहाँ निर्भय होकर रह सकूँगा, इसमें संशय नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 12.117: कुत्तेका शरभकी योनिमें जाकर महर्षिके शापसे पुन: कुत्ता हो जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 117: कुत्तेका शरभकी योनिमें जाकर महर्षिके शापसे पुन: कुत्ता हो जाना  »  श्लोक d5-d7
 
 
श्लोक  12.117.d5-d7 
पक्षिणामप्ययं दद्यात् कदाचिद् गारुडं बलम्॥
यावदन्यस्य सम्प्रीत: कारुण्यं च समाश्रित:।
न ददाति बलं तुष्ट: सत्त्वस्यान्यस्य कस्यचित्॥
तावदेनमहं विप्रं वधिष्यामि च शीघ्रत:।
स्थातुं मया शक्यमिह मुनिघातान्न संशय:॥ )
 
 
अनुवाद
यदि वह चाहे तो पक्षियों को भी गरुड़ का बल दे सकता है। अतः जब तक वह किसी अन्य जीव पर प्रसन्न या संतुष्ट होकर दया करके उसे भी वैसा ही बल न दे, मैं शीघ्र ही इस ब्रह्मर्षिक का वध कर दूँगा। ऋषि के वध के पश्चात् मैं यहाँ निर्भय होकर रह सकूँगा, इसमें संशय नहीं है।
 
If he wishes, he can give the strength of Garuda to birds also. Therefore, unless he is pleased or satisfied with any other living being and gives similar strength to it out of compassion, I shall kill this Brahmarshika very soon. After the killing of the sage, I shall be able to live here without any fear, there is no doubt about it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)