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mahabharat 12.117.22: ‘यद्यपि तू नीच कुल में उत्पन्न हुआ है, फिर भी मैंने प्रेमवश तुझे त्याग नहीं दिया। हे पापी! मेरे मन में तेरे प्रति कभी कोई पाप-भावना नहीं रही, फिर भी तू मुझे इस प्रकार मारना चाहता है; अतः तू अपने पूर्व रूप में जाकर कुत्ता हो जा॥ 22॥   |   mahabharat अध्याय 12.117: कुत्तेका शरभकी योनिमें जाकर महर्षिके शापसे पुन: कुत्ता हो जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 117: कुत्तेका शरभकी योनिमें जाकर महर्षिके शापसे पुन: कुत्ता हो जाना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.117.22 
मया स्नेहपरीतेन विसृष्टो न कुलान्वय:।
यस्मादेवमपापं मां पाप हिंसितुमिच्छसि।
तस्मात् स्वयोनिमापन्न: श्वैव त्वं हि भविष्यसि॥ २२॥
 
 
अनुवाद
‘यद्यपि तू नीच कुल में उत्पन्न हुआ है, फिर भी मैंने प्रेमवश तुझे त्याग नहीं दिया। हे पापी! मेरे मन में तेरे प्रति कभी कोई पाप-भावना नहीं रही, फिर भी तू मुझे इस प्रकार मारना चाहता है; अतः तू अपने पूर्व रूप में जाकर कुत्ता हो जा॥ 22॥
 
‘Although you were born in a low caste, I did not abandon you out of love. Sinner! I never had any sinful feelings towards you, yet you want to kill me in this manner; therefore you should return to your previous form and become a dog.’॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)