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mahabharat 12.116.3: एक बहुत ही निर्जन वन में एक ऋषि रहते थे जो नियमों का पालन करते थे और अपनी इंद्रियों को वश में रखते थे तथा कंद-मूल और फल खाकर जीवन निर्वाह करते थे।   |   mahabharat अध्याय 12.116: सज्जनोंके चरित्रके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक महर्षि और कुत्तेकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 116: सज्जनोंके चरित्रके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक महर्षि और कुत्तेकी कथा  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.116.3 
वने महति कस्मिंश्चिदमनुष्यनिषेविते।
ऋषिर्मूलफलाहारो नियतो नियतेन्द्रिय:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
एक बहुत ही निर्जन वन में एक ऋषि रहते थे जो नियमों का पालन करते थे और अपनी इंद्रियों को वश में रखते थे तथा कंद-मूल और फल खाकर जीवन निर्वाह करते थे।
 
In a very secluded forest there lived a sage who followed rules and controlled his senses and lived on roots and fruits. 3.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)