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mahabharat 12.115.6-7: जो राजा बुरी वस्तुओं के संग्रह में आसक्त हो, काम-वासना में लीन हो गया हो तथा अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण न होने के कारण सज्जन बनने का प्रयत्न न करता हो, उसके कुलीन कुल में उत्पन्न सभी सेवक भी अनिष्ट गुणों वाले हो जाते हैं। ऐसी दशा में राजा सेवक रखने से होने वाले लाभ, जैसे धन-वृद्धि आदि से वंचित हो जाता है ॥6-7॥   |   mahabharat अध्याय 12.115: राजा तथा राजसेवकोंके आवश्यक गुण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 115: राजा तथा राजसेवकोंके आवश्यक गुण  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  12.115.6-7 
यो ह्यसत्प्रग्रहरति: स्नेहरागबलात्कृत:।
इन्द्रियाणामनीशत्वादसज्जनबुभूषक:॥ ६॥
तस्य भृत्या विगुणतां यान्ति सर्वे कुलोद्‍गता:।
न च भृत्यफलैरर्थै: स राजा सम्प्रयुज्यते॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जो राजा बुरी वस्तुओं के संग्रह में आसक्त हो, काम-वासना में लीन हो गया हो तथा अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण न होने के कारण सज्जन बनने का प्रयत्न न करता हो, उसके कुलीन कुल में उत्पन्न सभी सेवक भी अनिष्ट गुणों वाले हो जाते हैं। ऐसी दशा में राजा सेवक रखने से होने वाले लाभ, जैसे धन-वृद्धि आदि से वंचित हो जाता है ॥6-7॥
 
All the servants born in a noble family of a king who is addicted to collecting evil things, who has fallen prey to love and passion and who does not try to become a gentleman due to lack of control over his senses, also become of unfavorable qualities. In such a condition, the king is deprived of the benefits of keeping servants, such as increase in wealth etc. ॥ 6-7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)