प्राकृतो हि प्रशंसन् वा निन्दन् वा किं करिष्यति।
वने काक इवाबुद्धिर्वाशमानो निरर्थकम्॥ ८॥
अनुवाद
जैसे वन में कौआ व्यर्थ ही काँव-काँव करता है, वैसे ही मूर्ख मनुष्य भी अकारण ही निन्दा करता है। चाहे वह स्तुति करे या निन्दा, वह किसी का भला या अहित कैसे कर सकेगा? अर्थात् वह कुछ भी करने में समर्थ नहीं होगा। ॥8॥
Just like a crow in the forest caws in vain, similarly a foolish person criticizes without any reason. Whether he praises or criticizes, how will he do any good or harm to anyone? That is, he will not be able to do anything. ॥ 8॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥