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mahabharat 12.114.8: जैसे वन में कौआ व्यर्थ ही काँव-काँव करता है, वैसे ही मूर्ख मनुष्य भी अकारण ही निन्दा करता है। चाहे वह स्तुति करे या निन्दा, वह किसी का भला या अहित कैसे कर सकेगा? अर्थात् वह कुछ भी करने में समर्थ नहीं होगा। ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 12.114: दुष्ट मनुष्यद्वारा की हुई निन्दाको सह लेनेसे लाभ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 114: दुष्ट मनुष्यद्वारा की हुई निन्दाको सह लेनेसे लाभ  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.114.8 
प्राकृतो हि प्रशंसन् वा निन्दन् वा किं करिष्यति।
वने काक इवाबुद्धिर्वाशमानो निरर्थकम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
जैसे वन में कौआ व्यर्थ ही काँव-काँव करता है, वैसे ही मूर्ख मनुष्य भी अकारण ही निन्दा करता है। चाहे वह स्तुति करे या निन्दा, वह किसी का भला या अहित कैसे कर सकेगा? अर्थात् वह कुछ भी करने में समर्थ नहीं होगा। ॥8॥
 
Just like a crow in the forest caws in vain, similarly a foolish person criticizes without any reason. Whether he praises or criticizes, how will he do any good or harm to anyone? That is, he will not be able to do anything. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)