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mahabharat 12.114.5-6: वह मूर्ख उस पाप कर्म को करके सदैव अपनी प्रशंसा करता है और कहता है कि मैंने भरी सभा में अमुक माननीय व्यक्ति से ऐसी बातें कहीं कि वह लज्जा से भर गया, उसका मुख सूख गया और वह अधमरा हो गया। इस प्रकार निन्दनीय कर्म करके भी वह अपनी प्रशंसा करता है और उसे तनिक भी लज्जा नहीं आती।   |   mahabharat अध्याय 12.114: दुष्ट मनुष्यद्वारा की हुई निन्दाको सह लेनेसे लाभ   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 114: दुष्ट मनुष्यद्वारा की हुई निन्दाको सह लेनेसे लाभ  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  12.114.5-6 
इति संश्लाघते नित्यं तेन पापेन कर्मणा।
इदमुक्तो मया कश्चित् सम्मतो जनसंसदि॥ ५॥
स तत्र व्रीडित: शुष्को मृतकल्पोऽवतिष्ठते।
श्लाघन्नश्लाघनीयेन कर्मणा निरपत्रप:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
वह मूर्ख उस पाप कर्म को करके सदैव अपनी प्रशंसा करता है और कहता है कि मैंने भरी सभा में अमुक माननीय व्यक्ति से ऐसी बातें कहीं कि वह लज्जा से भर गया, उसका मुख सूख गया और वह अधमरा हो गया। इस प्रकार निन्दनीय कर्म करके भी वह अपनी प्रशंसा करता है और उसे तनिक भी लज्जा नहीं आती।
 
That fool always praises himself by doing that sinful act and says that I said such things to a certain respected person in the gathering that he was filled with shame, his face went dry and he became half dead. In this way, after doing condemnable deeds, he praises himself and does not feel even a little ashamed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)