विगर्हणां परमदुरात्मना कृतां
सहेत य: संसदि दुर्जनान्नर:।
पठेदिदं चापि निदर्शनं सदा
न वाङ्मयं स लभति किंचिदप्रियम्॥ २१॥
अनुवाद
जो मनुष्य इस दृष्टान्त को सदैव पढ़ता या सुनता है, तथा सभा में अत्यन्त दुष्ट व्यक्ति द्वारा कही गई निन्दा को भी सहन करता है, उसे दुष्ट व्यक्ति के वचनों द्वारा की गई निन्दा से होने वाली किंचित मात्र भी पीड़ा कभी नहीं सहनी पड़ती ॥ 21॥
He who always reads or listens to this parable, and who tolerates the slander uttered by an extremely wicked person in a public gathering, will never have to suffer even the slightest pain caused by slander through words of an evil person. ॥ 21॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि टिट्टिभकं नाम चतुर्दशाधिकशततमोऽध्याय:॥ ११४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११४॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥