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mahabharat 12.112.5: उस तपस्या के समाप्त होने पर पितामह ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए और उनसे वर मांगने को कहा ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.112: एक तपस्वी ऊँटके आलस्यका कुपरिणाम और राजाका कर्तव्य   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 112: एक तपस्वी ऊँटके आलस्यका कुपरिणाम और राजाका कर्तव्य  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.112.5 
तपसस्तस्य चान्तेऽथ प्रीतिमानभवद् विभु:।
वरेण च्छन्दयामास ततश्चैनं पितामह:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उस तपस्या के समाप्त होने पर पितामह ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए और उनसे वर मांगने को कहा ॥5॥
 
At the end of that penance, grandfather Lord Brahma became very happy. He asked him to ask for a boon. 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)