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mahabharat 12.112.17: अतः उचित यही है कि तुम ऐसे आलस्य को त्याग दो और अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हुए बुद्धिपूर्वक आचरण करो। मनुजी कहते हैं कि 'बुद्धि ही विजय का मूल है'॥17॥   |   mahabharat अध्याय 12.112: एक तपस्वी ऊँटके आलस्यका कुपरिणाम और राजाका कर्तव्य   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 112: एक तपस्वी ऊँटके आलस्यका कुपरिणाम और राजाका कर्तव्य  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.112.17 
त्वमप्येवंविधं हित्वा योगेन नियतेन्द्रिय:।
वर्तस्व बुद्धिमूलं तु विजयं मनुरब्रवीत्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
अतः उचित यही है कि तुम ऐसे आलस्य को त्याग दो और अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हुए बुद्धिपूर्वक आचरण करो। मनुजी कहते हैं कि 'बुद्धि ही विजय का मूल है'॥17॥
 
Therefore, it is appropriate for you to give up such laziness and behave intelligently while keeping your senses under control. Manuji says that 'Intelligence is the root of victory'.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)