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mahabharat 12.112.12: हे भरतश्रेष्ठ! वह मांसभक्षी सियार अत्यन्त भूख से पीड़ित था, इसलिए वह ऊँट के गले के मांस को टुकड़े-टुकड़े करके खाने लगा॥12॥   |   mahabharat अध्याय 12.112: एक तपस्वी ऊँटके आलस्यका कुपरिणाम और राजाका कर्तव्य   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 112: एक तपस्वी ऊँटके आलस्यका कुपरिणाम और राजाका कर्तव्य  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  12.112.12 
स दृष्ट्वा मांसजीवी तु सुभृशं क्षुच्छ्रमान्वित:।
अभक्षयत् ततो ग्रीवामुष्ट्रस्य भरतर्षभ॥ १२॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! वह मांसभक्षी सियार अत्यन्त भूख से पीड़ित था, इसलिए वह ऊँट के गले के मांस को टुकड़े-टुकड़े करके खाने लगा॥12॥
 
O best of the Bharatas! That carnivorous jackal was suffering from extreme hunger, so he began to eat the flesh from the camel's neck by cutting it into pieces.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)