श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 112: एक तपस्वी ऊँटके आलस्यका कुपरिणाम और राजाका कर्तव्य  » 
 
 
अध्याय 112: एक तपस्वी ऊँटके आलस्यका कुपरिणाम और राजाका कर्तव्य
 
श्लोक 1:  युधिष्ठिर ने पूछा, "हे पुण्यात्माओं में महान पितामह! राजा को क्या करना चाहिए? वह सुखी रहने के लिए क्या कर सकता है? मुझे विस्तारपूर्वक बताइए।" ॥1॥
 
श्लोक 2:  भीष्म बोले - 'हे मनुष्यों! राजा के कर्तव्य और उसके सुखी रहने के लिए जो कुछ किया जा सकता है, उसका निश्चय करके मैं तुम्हें बताता हूँ। उसे सुनो।'
 
श्लोक 3:  युधिष्ठिर! हमने ऊँट की महान कथा सुनी है, उसे सुनो। राजा को ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए॥3॥
 
श्लोक 4:  प्रजापतयुग (सतयुग) में एक महान ऊँट था। उसे अपने पूर्वजन्म की बातें याद आ गईं। उसने कठोर व्रतों का व्रत लिया और वन में घोर तपस्या करने लगा। 4.
 
श्लोक 5:  उस तपस्या के समाप्त होने पर पितामह ब्रह्माजी बहुत प्रसन्न हुए और उनसे वर मांगने को कहा ॥5॥
 
श्लोक 6:  ऊँट बोला - हे प्रभु! आपकी कृपा से मेरी गर्दन बहुत बड़ी हो जाए, जिससे जब मैं चरने जाऊँ तो सौ योजन से भी अधिक दूरी से खाद्य पदार्थ खा सकूँ।
 
श्लोक 7:  वरदानदाता ब्रह्माजी ने 'ऐसा ही हो' कहकर उसे उसका इच्छित वरदान दे दिया। उत्तम वरदान पाकर ऊँट अपने वन में वापस चला गया।
 
श्लोक 8:  वरदान पाकर वह मूढ़ बुद्धि वाला ऊँट कहीं भी जाने में आलसी हो गया। काल के मोह में पड़ा हुआ वह दुष्टात्मा कहीं भी चरने के लिए नहीं जाना चाहता था। 8.
 
श्लोक 9:  एक बार की बात है, वह सौ योजन लंबी गर्दन तानकर चर रहा था। चरते-चरते उसका मन कभी नहीं थकता था। तभी बहुत तेज़ हवा चलने लगी।
 
श्लोक 10:  वह पशु गुफा में गर्दन गड़ाकर चर रहा था, उसी समय भारी वर्षा होने लगी, जिससे सारा जगत जल से निमग्न हो गया॥10॥
 
श्लोक 11:  जब वर्षा आरम्भ हुई, तो भूख और थकान से व्याकुल एक सियार अपनी पत्नी सहित शीघ्र ही गुफा में घुस आया। वह गर्मी से पीड़ित था और ठंड के कारण उसके सभी अंग अकड़ रहे थे।
 
श्लोक 12:  हे भरतश्रेष्ठ! वह मांसभक्षी सियार अत्यन्त भूख से पीड़ित था, इसलिए वह ऊँट के गले के मांस को टुकड़े-टुकड़े करके खाने लगा॥12॥
 
श्लोक 13:  जब पशु को यह मालूम हुआ कि उसकी गर्दन खाई जा रही है, तब वह बहुत दुःखी हुआ और उसे समेटने का प्रयत्न करने लगा ॥13॥
 
श्लोक 14:  वह पशु अभी भी अपनी गर्दन ऊपर-नीचे हिलाने की चेष्टा कर रहा था कि सियार ने अपनी स्त्री सहित उसे काट लिया और खा गया ॥14॥
 
श्लोक 15:  इस प्रकार ऊँट को मारकर खाने के बाद जब आँधी और बारिश बंद हो गई तो सियार गुफा से बाहर निकल गया।
 
श्लोक 16:  इस प्रकार मूर्ख ऊँट की मृत्यु हो गई। देखो, उसने अपने आलस्य के कारण कितना बड़ा पाप किया।
 
श्लोक 17:  अतः उचित यही है कि तुम ऐसे आलस्य को त्याग दो और अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हुए बुद्धिपूर्वक आचरण करो। मनुजी कहते हैं कि 'बुद्धि ही विजय का मूल है'॥17॥
 
श्लोक 18:  भारत! बुद्धिबल से किए गए कार्य श्रेष्ठ हैं। बाहुबल से किए गए कार्य मध्यम हैं। जाँघों या पैरों के बल से किए गए कार्य निकृष्टतम (सबसे निकृष्ट) हैं और सिर से बोझ उठाना सबसे निकृष्ट कोटि का कार्य है।॥18॥
 
श्लोक 19:  जो अपनी इन्द्रियों को वश में रखता है और कर्मों में कुशल है, वही स्थिर राज्य पा सकता है। मनु कहते हैं कि संकट में राजा की विजय का आधार उसकी बुद्धि है।॥19॥
 
श्लोक 20:  हे निष्पाप युधिष्ठिर! जो गुप्त मंत्रणा सुनता है, जिसके पास अच्छे सहायक होते हैं और जो कोई भी कार्य पूर्ण ज्ञान और समझ के साथ करता है, उसके पास ही धन स्थिर रहता है। सहायकों से युक्त राजा ही सम्पूर्ण पृथ्वी पर शासन कर सकता है।
 
श्लोक 21:  हे महेन्द्र के समान प्रभावशाली राजन! पूर्वकाल में राज्य-व्यवस्था जानने वाले श्रेष्ठ पुरुषों ने यही कहा था। मैंने भी शास्त्रों के अनुसार यही कहा है। हे राजन! इसे अच्छी तरह समझकर तदनुसार आचरण करो॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)