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mahabharat 12.111.85: प्रेम का बंधन तोड़ना बहुत कठिन है, परन्तु एक बार टूट जाने पर उसे फिर जोड़ना भी कठिन है। जो प्रेम बार-बार टूटता और जुड़ता है, उसमें स्नेह नहीं होता॥ 85॥   |   mahabharat अध्याय 12.111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 85
 
 
श्लोक  12.111.85 
दु:खेन श्लिष्यते भिन्नं श्लिष्टं दु:खेन भिद्यते।
भिन्ना श्लिष्टा तु या प्रीतिर्न सा स्नेहेन वर्तते॥ ८५॥
 
 
अनुवाद
प्रेम का बंधन तोड़ना बहुत कठिन है, परन्तु एक बार टूट जाने पर उसे फिर जोड़ना भी कठिन है। जो प्रेम बार-बार टूटता और जुड़ता है, उसमें स्नेह नहीं होता॥ 85॥
 
‘The bond of love is very difficult to break, but once it is broken, it is very difficult to mend it again. The love which breaks and joins again and again does not have affection.॥ 85॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)