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mahabharat 12.111.80: जब मैं एक बार भ्रष्ट हो चुका हूँ और अपने पद से अपमानित हो चुका हूँ, तो तुम मुझ पर दोबारा कैसे भरोसा कर पाओगे? या मैं तुम्हारे साथ कैसे रह पाऊँगा?   |   mahabharat अध्याय 12.111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  12.111.80 
अवमानेन युक्तस्य स्थानभ्रष्टस्य वा पुन:।
कथं यास्यसि विश्वासमहं तिष्ठामि वा कथम्॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
जब मैं एक बार भ्रष्ट हो चुका हूँ और अपने पद से अपमानित हो चुका हूँ, तो तुम मुझ पर दोबारा कैसे भरोसा कर पाओगे? या मैं तुम्हारे साथ कैसे रह पाऊँगा?
 
When I have once been corrupted and humiliated from my position, how will you ever be able to trust me again? Or how will I be able to stay with you?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)