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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 60-61h
 
 
श्लोक  12.111.60-61h 
शुचेरपि हि युक्तस्य दोष एव निपात्यते।
मुनेरपि वनस्थस्य स्वानि कर्माणि कुर्वत:॥ ६०॥
उत्पाद्यन्ते त्रय: पक्षा मित्रोदासीनशत्रव:।
 
 
अनुवाद
कोई व्यक्ति कितना ही पवित्र और परिश्रमी क्यों न हो, लोग उस पर दोषारोपण करते ही हैं। धर्मकार्य में लगे हुए वनवासी मुनि के भी तीन पक्ष होते हैं - शत्रु, मित्र और उदासीन॥60 1/2॥
 
‘No matter how pure and industrious a person is, people always accuse him. Even a forest dwelling sage engaged in religious activities has three sides – enemies, friends and indifferents.॥ 60 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)