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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  12.111.47 
समयोऽयं कृतस्तेन साचिव्यमुपगच्छता।
नोपघातस्त्वया कार्यो राजन् मैत्रीमिहेच्छता॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
मंत्री बनते समय सियार ने यह शर्त रखी थी कि हे राजन! यदि आप मुझसे मित्रता चाहते हैं तो किसी के बहकावे में आकर मेरा विनाश मत कीजिए।
 
While becoming a minister, the jackal had put this condition that O King! If you want friendship with me, then do not get misled by anyone and destroy me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)