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mahabharat 12.111.30: जो लोग राजा के संरक्षण में रहते हैं, उन्हें राजा की निन्दा करने से होने वाले समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। दूसरी ओर मेरे जैसे वनवासियों के व्रत-अनुष्ठान आसक्ति और भय से सर्वथा मुक्त होते हैं ॥30॥   |   mahabharat अध्याय 12.111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.111.30 
राजोपक्रोशदोषाश्च सर्वे संश्रयवासिनाम्।
व्रतचर्या तु नि:संगा निर्भया वनवासिनाम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जो लोग राजा के संरक्षण में रहते हैं, उन्हें राजा की निन्दा करने से होने वाले समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। दूसरी ओर मेरे जैसे वनवासियों के व्रत-अनुष्ठान आसक्ति और भय से सर्वथा मुक्त होते हैं ॥30॥
 
Those who live under the protection of the king, get all the sins associated with criticizing the king. On the other hand, the fasting rituals of forest dwellers like me are completely free from attachment and fear. ॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)