श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.111.15 
भवन्त: स्वार्थलोभेन केवलं भक्षणे रता:।
अनुबन्धे त्रयो दोषास्तान् न पश्यन्ति मोहिता:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
‘तुम लोग केवल स्वार्थ के लिए ही मांसाहार में लगे हुए हो। अपनी आसक्ति के कारण तुम उससे प्राप्त होने वाले तीन दोषों को नहीं देखते॥15॥
 
‘You people are engaged in eating meat only for the sake of selfishness. Due to your attachment you do not notice the three defects that are acquired as a result of it.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)