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mahabharat 12.111.14: यदि कोई आश्रम में रहकर ब्राह्मण की हत्या करे, तो क्या उसे पाप नहीं लगेगा? और यदि कोई आश्रम में रहकर गौदान करे, तो क्या वह व्यर्थ होगा?॥14॥   |   mahabharat अध्याय 12.111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 111: मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.111.14 
आश्रमे यो द्विजं हन्याद् गां वा दद्यादनाश्रमे।
किं तु तत्पातकं न स्यात् तद्वा दत्तं वृथा भवेत्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई आश्रम में रहकर ब्राह्मण की हत्या करे, तो क्या उसे पाप नहीं लगेगा? और यदि कोई आश्रम में रहकर गौदान करे, तो क्या वह व्यर्थ होगा?॥14॥
 
'If someone kills a Brahmin while staying in an ashram, will he not commit any sin? And if someone donates a cow without being in an ashram, will it be futile?॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)