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mahabharat 12.11.27: अर्जुन कहते हैं - महाराज ! पक्षीरूपधारी इन्द्र के हितकर और अर्थपूर्ण वचन सुनकर वे ब्राह्मण बालक इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जिस मार्ग पर हम चल रहे हैं, वह हमारे लिए हितकर नहीं है। अतः वे उसे छोड़कर घर लौट आए और गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए वहीं रहने लगे॥ 27॥   |   mahabharat अध्याय 12.11: अर्जुनका पक्षिरूपधारी इन्द्र और ऋषिबालकोंके संवादका उल्लेखपूर्वक गृहस्थ-धर्मके पालनपर जोर देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.11.27 
अर्जुन उवाच
ततस्ते तद् वच: श्रुत्वा धर्मार्थसहितं हितम्।
उत्सृज्य नास्तीति गता गार्हस्थ्यं समुपाश्रिता:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
अर्जुन कहते हैं - महाराज ! पक्षीरूपधारी इन्द्र के हितकर और अर्थपूर्ण वचन सुनकर वे ब्राह्मण बालक इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जिस मार्ग पर हम चल रहे हैं, वह हमारे लिए हितकर नहीं है। अतः वे उसे छोड़कर घर लौट आए और गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए वहीं रहने लगे॥ 27॥
 
Arjun says - Maharaj! After listening to the beneficial and meaningful words of Indra who was in the form of a bird, the Brahmin boy came to the conclusion that the path we are following is not beneficial for us. So, they left it and returned home and started living there following the household duties.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)