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mahabharat 12.11.19: हवन-कर्म द्वारा देवताओं को, स्वाध्याय द्वारा ब्रह्मऋषियों को तथा श्राद्ध द्वारा सनातन पितरों को अपना अंश समर्पित करके गुरु की सेवा करना कठिन व्रत कहलाता है ॥19॥   |   mahabharat अध्याय 12.11: अर्जुनका पक्षिरूपधारी इन्द्र और ऋषिबालकोंके संवादका उल्लेखपूर्वक गृहस्थ-धर्मके पालनपर जोर देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 11: अर्जुनका पक्षिरूपधारी इन्द्र और ऋषिबालकोंके संवादका उल्लेखपूर्वक गृहस्थ-धर्मके पालनपर जोर देना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.11.19 
देववंशान् ब्रह्मवंशान् पितृवंशांश्च शाश्वतान्।
संविभज्य गुरोश्चर्यां तद् वै दुष्करमुच्यते॥ १९॥
 
 
अनुवाद
हवन-कर्म द्वारा देवताओं को, स्वाध्याय द्वारा ब्रह्मऋषियों को तथा श्राद्ध द्वारा सनातन पितरों को अपना अंश समर्पित करके गुरु की सेवा करना कठिन व्रत कहलाता है ॥19॥
 
Serving the Guru by dedicating one's share to the gods through Havan-karma, to the Brahmarishis through Swadhyaya and to the eternal ancestors through Shraddha is called a difficult fast. 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)