Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.11.18: मन्त्रों को देखने वाले ऋषि ने एक मन्त्र में कहा है कि ‘यह यज्ञरूपी अनुष्ठान तुम सब यजमानों को करना चाहिए, किन्तु इसके साथ तप भी होना चाहिए। यदि तुम इस अनुष्ठान को करोगे, तो मैं तुम्हें मनोवांछित फल दूँगा।’ अतः उन समस्त वैदिक अनुष्ठानों में पूर्णतया संलग्न रहना ही तपस्वी की ‘तपस्या’ कही गई है।॥18॥ | mahabharat अध्याय 12.11: अर्जुनका पक्षिरूपधारी इन्द्र और ऋषिबालकोंके संवादका उल्लेखपूर्वक गृहस्थ-धर्मके पालनपर जोर देना । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
मन्त्रों को देखने वाले ऋषि ने एक मन्त्र में कहा है कि ‘यह यज्ञरूपी अनुष्ठान तुम सब यजमानों को करना चाहिए, किन्तु इसके साथ तप भी होना चाहिए। यदि तुम इस अनुष्ठान को करोगे, तो मैं तुम्हें मनोवांछित फल दूँगा।’ अतः उन समस्त वैदिक अनुष्ठानों में पूर्णतया संलग्न रहना ही तपस्वी की ‘तपस्या’ कही गई है।॥18॥
The sage who has seen the mantras has said in a mantra that 'This yajna-like ritual may be performed by all of you yajamanas, but it should be accompanied by austerity. If you perform this ritual, I will give you the desired result.' Therefore, being completely involved in all those Vedic rituals is called the 'tapasya' of an ascetic.॥ 18॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥