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mahabharat 12.108.5: जो कोई उनकी आज्ञाओं का पालन करने में संलग्न है, उसे किसी अन्य धर्म का पालन करने की आवश्यकता नहीं है। धर्मात्माओं को विश्वास है कि जो कुछ वे कर्म करने की आज्ञा देते हैं, वही सच्चा धर्म है। ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.108: माता-पिता तथा गुरुकी सेवाका महत्त्व   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 108: माता-पिता तथा गुरुकी सेवाका महत्त्व  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.108.5 
न च तैरभ्यनुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत्।
यं च तेऽभ्यनुजानीयु: स धर्म इति निश्चय:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जो कोई उनकी आज्ञाओं का पालन करने में संलग्न है, उसे किसी अन्य धर्म का पालन करने की आवश्यकता नहीं है। धर्मात्माओं को विश्वास है कि जो कुछ वे कर्म करने की आज्ञा देते हैं, वही सच्चा धर्म है। ॥5॥
 
There is no need for anyone who is involved in following His commands to follow any other religion. The righteous are sure that whatever work He commands is the true religion. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)