श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 108: माता-पिता तथा गुरुकी सेवाका महत्त्व  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.108.33 
एतत्सर्वमनिर्देशेनैवमुक्तं
यत् कर्तव्यं पुरुषेणेह लोके।
एतच्छ्रेयो नान्यदस्माद् विशिष्टं
सर्वान् धर्माननुसृत्यैतदुक्तम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
इस संसार में मनुष्य को जिन-जिन बातों का पालन करना है, उन सबका यहाँ विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। यही कल्याण का मार्ग है। इससे बढ़कर कोई दूसरा कर्तव्य नहीं है। सभी धर्मों का पालन करने से, सबका सार यहाँ बताया गया है। ॥33॥
 
All these things which are to be followed by a man in this world have been explained here in detail. This is the path of welfare. There is no other duty greater than this. By following all the dharmas, the essence of all has been explained here. ॥ 33॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि मातृपितृगुरुमाहात्म्ये अष्टाधिकशततमोऽध्याय:॥ १०८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें माता-पिता और गुरुका माहात्म्यविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हआ॥ १०८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)