श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 108: माता-पिता तथा गुरुकी सेवाका महत्त्व  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.108.30 
उपाध्यायं पितरं मातरं च
येऽभिद्रुह्यन्ते मनसा कर्मणा वा।
तेषां पापं भ्रूणहत्याविशिष्टं
तस्मान्नान्य: पापकृदस्ति लोके॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जो लोग मन, वचन और कर्म से गुरु, पिता और माता का द्रोह करते हैं, वे भ्रूण-हत्या से भी बड़ा पाप करते हैं। संसार में उनसे बड़ा कोई पापी नहीं है ॥30॥
 
Those who betray their teacher, father and mother by their thoughts, words and actions, commit a sin greater than that of killing an embryo. There is no greater sinner than them in the world. ॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)