श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 108: माता-पिता तथा गुरुकी सेवाका महत्त्व  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  12.108.26 
येन प्रीणात्युपाध्यायं तेन स्याद् ब्रह्म पूजितम्।
मातृत: पितृतश्चैव तस्मात् पूज्यतमो गुरु:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
जिस कार्य से शिष्य उपाध्याय (विद्यागुरु) को प्रसन्न करता है, उसी से परमेश्वर की पूजा पूर्ण होती है; इसलिए गुरु माता-पिता से भी अधिक पूजनीय हैं ॥26॥
 
The worship of the Supreme God is completed by the work by which the disciple pleases the Upadhyaya (Vidyaguru); Therefore, Guru is more worshipable than parents. 26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)