श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 108: माता-पिता तथा गुरुकी सेवाका महत्त्व  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.108.25 
येन प्रीणाति पितरं तेन प्रीत: प्रजापति:।
प्रीणाति मातरं येन पृथिवी तेन पूजिता॥ २५॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य जिस कर्म से अपने पिता को प्रसन्न करता है, उससे ब्रह्मा जी भी प्रसन्न होते हैं और जिस आचरण से वह अपनी माता को प्रसन्न करता है, उससे सम्पूर्ण पृथ्वी भी पूजित होती है ॥25॥
 
By the deeds of a man which pleases his father, by that also Lord Brahma is pleased and by the behaviour by which he pleases his mother, by that also the entire earth is worshipped. ॥25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)