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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 108: माता-पिता तथा गुरुकी सेवाका महत्त्व
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श्लोक 13
श्लोक
12.108.13
न चायं न परो लोकस्तस्य चैव परंतप।
अमानिता नित्यमेव यस्यैते गुरुवस्त्रय:॥ १३॥
अनुवाद
हे शत्रुओं को कष्ट देने वाले राजा! जिसने इन तीनों गुरुओं का सदैव अनादर किया है, उसके लिए न तो यह लोक सुखदायी होगा और न ही परलोक॥13॥
O King who torments his enemies! For one who has always disrespected these three Gurus, neither this world nor the next world will be pleasant. ॥ 13॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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