श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 108: माता-पिता तथा गुरुकी सेवाका महत्त्व  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  12.108.10-11 
नैतानतिशयेज्जातु नात्यश्नीयान्न दूषयेत्॥ १०॥
नित्यं परिचरेच्चैव तद् वै सुकृतमुत्तमम्।
कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥ ११॥
 
 
अनुवाद
इन तीनों की आज्ञा का कभी उल्लंघन न करो, इन्हें खिलाए बिना न खाओ, इनकी निन्दा न करो और सदैव इनकी सेवा में लगे रहो। यही श्रेष्ठ पुण्य है। हे राजन! इनकी सेवा करने से तुम्हें यश, पवित्र नाम और उत्तम लोक की प्राप्ति होगी। ॥10-11॥
 
Never disobey the orders of these three, do not eat before feeding them, do not blame them and always remain engaged in their service. This is the best virtuous act. O best king! By serving them you will attain fame, sacred name and the best world. ॥10-11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)