श्लोक 1-5: युधिष्ठिर बोले, "किन्तु हे भरतपुत्र! आपने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के धर्मपूर्वक आचरण, उनके धन, जीविका के साधन और धर्म के फल का वर्णन किया है। राजाओं का धन, कोष, कोष संग्रह, शत्रुओं पर विजय, मंत्रियों के गुण और आचरण, प्रजा की उन्नति, संधि और युद्ध आदि छः गुणों का प्रयोग, सेना का आचरण, दुष्टों की पहचान, सज्जनों के लक्षण, जो आपके समान हैं, जो आपसे हीन हैं और जो आपसे श्रेष्ठ हैं - उन सभी लोगों के वास्तविक लक्षण, मध्यम वर्ग को संतुष्ट रखने के लिए प्रगतिशील राजा को किस प्रकार जीवनयापन करना चाहिए, दुर्बल व्यक्ति को गोद लेने और उसके लिए जीविका की व्यवस्था करने की आवश्यकता - इन सब विषयों को आपने धर्मानुसार, देश की रीति-नीति के अनुसार और शास्त्रों के अनुसार संक्षेप में प्रस्तुत किया है। 1-5।
श्लोक 6: हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ पितामह! आपने विजय की इच्छा रखने वाले राजा के आचरण का भी वर्णन किया है। अब मैं गणों (गणराज्यों) के आचरण और वृत्तांत को सुनना चाहता हूँ।॥6॥
श्लोक 7: भारत! मुझे यह सुनने की बड़ी इच्छा है कि गणतन्त्र राज्यों के लोग किस प्रकार उन्नति करते हैं, किस प्रकार वे आपस में मतभेद या फूट नहीं पड़ने देते, किस प्रकार वे शत्रुओं पर विजय पाने का प्रयत्न करते हैं और किस प्रकार वे मित्र बनाते हैं॥ 7॥
श्लोक 8: मैं देखता हूँ कि संयुक्त राज्य अमेरिका के विनाश का मुख्य कारण आंतरिक मतभेद हैं। मेरा मानना है कि बहुसंख्यक समुदाय के लिए किसी भी गुप्त सलाह या विचार को छिपाए रखना बहुत मुश्किल है।
श्लोक 9: परंतप राजन! मैं ये सब बातें पूरी सुनना चाहता हूँ। कृपया मुझे बताइए कि वे समूह या दल आपस में किस प्रकार विभाजित नहीं होते॥9॥
श्लोक 10: भीष्मजी बोले - भरतश्रेष्ठ! नरेश्वर! ये दो ही दुर्गुण हैं जो समूह, कुल और राजाओं में वैर की अग्नि प्रज्वलित करते हैं - लोभ और लालच॥10॥
श्लोक 11: पहले एक मनुष्य लोभ को चुनता है (दूसरे का धन हड़पने की इच्छा करता है), फिर दूसरे के मन में द्वेष उत्पन्न होता है; तब लोभ और द्वेष से प्रभावित दोनों व्यक्ति एक-दूसरे के नाशक बन जाते हैं, तथा समुदाय, धन और जन की बड़ी हानि उठाते हैं॥ 11॥
श्लोक 12: वे गुप्तचरों को भेजकर सूचनाएँ एकत्रित करते हैं, गुप्त मंत्रणा करते हैं और सेनाएँ एकत्रित करने लगते हैं। वे रिश्वत, रिश्वत और छल-कपट की युक्तियों का प्रयोग करते हैं तथा नरसंहार, बहुत सारा धन व्यय और नाना प्रकार का भय उत्पन्न करके एक-दूसरे को दुर्बल बनाते हैं।॥12॥
श्लोक 13: एक ही राज्य में रहने वाले गणराज्य के सैनिक भी यदि समय पर भोजन और वेतन न पाएँ, तो उनमें फूट पड़ जाती है। फूट पड़ने पर सबके मन एक-दूसरे के विरुद्ध हो जाते हैं और भय के मारे वे सब अपने शत्रुओं के आगे समर्पण कर देते हैं।॥13॥
श्लोक 14: संघ और गणराज्य आपस में फूट पड़ने से नष्ट हो जाते हैं। जब उनमें फूट पड़ जाती है, तो शत्रु उन्हें आसानी से परास्त कर देते हैं; इसलिए प्रजा को चाहिए कि वह संगठित होकर और एकमत होकर सदैव विजय के लिए प्रयत्न करे॥14॥
श्लोक 15: जो लोग सामूहिक शक्ति और पुरुषार्थ से संपन्न होते हैं, उन्हें सभी प्रकार की इच्छित वस्तुएँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। समूह के बाहर के लोग भी समूह में रहने वालों से मित्रता स्थापित कर लेते हैं।
श्लोक 16: बुद्धिमान लोग गणतंत्र के नागरिकों की प्रशंसा करते हैं। संगठित प्रजा में एक-दूसरे को धोखा देने की कोई दुर्भावना नहीं होती। वे सभी एक-दूसरे की सेवा करके सुखपूर्वक समृद्ध होते हैं॥16॥
श्लोक 17: गणतंत्र के श्रेष्ठ नागरिक शास्त्रानुसार धर्मानुसार आचरण स्थापित करते हैं। वे सबको सम्यक् दृष्टि से देखते हुए प्रगति की दिशा में आगे बढ़ते रहते हैं।॥17॥
श्लोक 18: गणराज्य के कुलीन पुरुष अपने पुत्रों और भाइयों को भी, यदि वे पथभ्रष्ट हो जाएँ, दण्डित करते हैं। उन्हें सदैव उत्तम शिक्षा प्रदान करते हैं और शिक्षा प्राप्त होने पर उन्हें बड़े आदर से स्वीकार करते हैं। इसीलिए वे विशेष उन्नति करते हैं॥18॥
श्लोक 19: महाबाहु युधिष्ठिर! गणराज्य के नागरिक गुप्तचर या दूत का कार्य करने, राज्य के हित के लिए गुप्त मंत्रणा करने, कानून बनाने तथा राज्य के लिए धन संचय करने आदि में सदैव तत्पर रहते हैं। इसीलिए वे सब प्रकार से समृद्ध होते हैं॥ 19॥
श्लोक 20: नरेश्वर! संघराज्य के सदस्य राज्य की उन्नति के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हैं, बुद्धिमान, वीर, महाउत्साही तथा सब कार्यों में प्रबल पुरुषार्थ करने वाले लोगों का सदैव आदर करते हैं, इसीलिए वे शीघ्रता से आगे बढ़ते हैं। 20॥
श्लोक 21: गणतन्त्र के सभी नागरिक धनवान, वीर, शस्त्रों के ज्ञाता और शास्त्रों के पारंगत हैं। वह कठिन समय में मोहग्रस्त लोगों की रक्षा करता रहता है। 21॥
श्लोक 22: हे भारतश्रेष्ठ! यदि संघराज्य के लोगों में क्रोध, फूट, भय, दण्ड, दूसरों को कमजोर करने, बाँधने या मारने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाए, तो वह उन्हें तुरन्त ही शत्रुओं के वश में कर देती है।
श्लोक 23: राजन! अतः आपको गणराज्य के सभी प्रमुख अधिकारियों का आदर करना चाहिए; क्योंकि लोकयात्रा का महान भार उन्हीं पर है।
श्लोक 24: शत्रुसूदन! भरत! गण या संघ के सभी लोग गुप्त मंत्रणा सुनने के अधिकारी नहीं हैं। मंत्रणा को गुप्त रखने और गुप्तचरों की नियुक्ति का कार्य केवल अतिविशिष्ट व्यक्तियों का ही दायित्व है। 24.
श्लोक 25-26h: समूह के प्रमुख व्यक्तियों को एक साथ मिलकर सम्पूर्ण गणराज्य के कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए; अन्यथा यदि समूह में फूट पड़ जाए और अनेक पृथक् समूह उत्पन्न हो जाएं, तो उसके समस्त कार्य नष्ट हो जाते हैं और अनेक विपत्तियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।॥25 1/2॥
श्लोक 26-27h: संघ राज्य के विद्वान अधिकारियों को चाहिए कि वे जनता में से उन मुख्य नेताओं का तुरन्त दमन करें जो आपस में फूट डालकर अलग-अलग अपनी शक्ति का प्रयोग कर रहे हैं। 26 1/2॥
श्लोक 27-28h: यदि कुल के बुजुर्ग परिवार के भीतर होने वाले विवादों की अनदेखी करते हैं, तो वे झगड़ा करने वाले समूहों में फूट डालते हैं और पूरे कुल को नष्ट कर देते हैं।
श्लोक 28-29h: आंतरिक भय को दूर करके संघ की रक्षा करनी चाहिए। यदि संघ में एकता बनी रहे, तो बाह्य भय उसके लिए व्यर्थ है (वह उसे किसी भी प्रकार से हानि नहीं पहुँचा सकता)। हे राजन! आंतरिक भय संघ की जड़ों को तुरंत काट देता है। 28 1/2।
श्लोक 29-30h: जब संघ के सदस्य अचानक क्रोध या आसक्ति के कारण या स्वाभाविक लोभ के कारण भी एक-दूसरे से बातचीत करना बंद कर देते हैं, तो यह उनकी पराजय का संकेत है ॥29 1/2॥
श्लोक 30-32: जाति और कुल में तो सब समान हो सकते हैं; परन्तु उद्योग, बुद्धि और सौन्दर्य में सबका समान होना सम्भव नहीं है। शत्रुगण, गणतन्त्र के लोगों में मतभेद उत्पन्न करके तथा उनमें से कुछ को धन देकर सम्पूर्ण संघ में फूट डालते हैं; अतः गणतन्त्र के नागरिकों का संगठित रहना ही सबसे बड़ा आश्रय है ॥30-32॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥