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mahabharat 12.106.3: मैं इस संसार में दया और धर्म का आश्रय लेकर रहना चाहता हूँ। मैं ऐसा अधर्म कर्म कभी नहीं कर सकता, और आपका ऐसा उपदेश देना भी उचित नहीं है॥3॥   |   mahabharat अध्याय 12.106: कालकवृक्षीय मुनिका विदेहराज तथा कोसलराजकुमारमें मेल कराना और विदेहराजका कोसलराजको अपना जामाता बना लेना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 106: कालकवृक्षीय मुनिका विदेहराज तथा कोसलराजकुमारमें मेल कराना और विदेहराजका कोसलराजको अपना जामाता बना लेना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.106.3 
आनृशंस्येन धर्मेण लोके ह्यस्मिन् जिजीविषु:।
नाहमेतदलं कर्तुं नैतत् त्वय्युपपद्यते॥ ३॥
 
 
अनुवाद
मैं इस संसार में दया और धर्म का आश्रय लेकर रहना चाहता हूँ। मैं ऐसा अधर्म कर्म कभी नहीं कर सकता, और आपका ऐसा उपदेश देना भी उचित नहीं है॥3॥
 
I want to live in this world by taking shelter of compassion and religion. I can never commit such unrighteous acts, and it is not appropriate for you to preach like this.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)