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mahabharat 12.106.18: ‘पिताजी! न तो कोई सदैव विजयी होता है और न ही सदैव पराजित। जैसे राजा दूसरों को जीतकर उनका तथा उनके धन का उपभोग करता है, वैसे ही उसे भी दूसरों को उनके धन का उपभोग करने का अवसर देना चाहिए॥18॥   |   mahabharat अध्याय 12.106: कालकवृक्षीय मुनिका विदेहराज तथा कोसलराजकुमारमें मेल कराना और विदेहराजका कोसलराजको अपना जामाता बना लेना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 106: कालकवृक्षीय मुनिका विदेहराज तथा कोसलराजकुमारमें मेल कराना और विदेहराजका कोसलराजको अपना जामाता बना लेना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.106.18 
नैव नित्यं जयस्तात नैव नित्यं पराजय:।
तस्माद् भोजयितव्यश्च भोक्तव्यश्च परो जन:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
‘पिताजी! न तो कोई सदैव विजयी होता है और न ही सदैव पराजित। जैसे राजा दूसरों को जीतकर उनका तथा उनके धन का उपभोग करता है, वैसे ही उसे भी दूसरों को उनके धन का उपभोग करने का अवसर देना चाहिए॥18॥
 
‘Father! No one is always victorious nor is always defeated. Just as a king conquers other people and enjoys them and their wealth, similarly he should also give others an opportunity to enjoy their wealth.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)