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mahabharat 12.106.1: राजा ने कहा, "ब्राह्मण! मैं छल-कपट और अहंकार का सहारा लेकर जीवनयापन नहीं करना चाहता। यदि अधर्म से मुझे बहुत-सा धन भी मिल जाए, तो भी मैं उसकी इच्छा नहीं करता।"   |   mahabharat अध्याय 12.106: कालकवृक्षीय मुनिका विदेहराज तथा कोसलराजकुमारमें मेल कराना और विदेहराजका कोसलराजको अपना जामाता बना लेना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 106: कालकवृक्षीय मुनिका विदेहराज तथा कोसलराजकुमारमें मेल कराना और विदेहराजका कोसलराजको अपना जामाता बना लेना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.106.1 
राजोवाच
न निकृत्या न दम्भेन ब्रह्मन्निच्छामि जीवितुम्।
नाधर्मयुक्तानिच्छेयमर्थान् सुमहतोऽप्यहम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
राजा ने कहा, "ब्राह्मण! मैं छल-कपट और अहंकार का सहारा लेकर जीवनयापन नहीं करना चाहता। यदि अधर्म से मुझे बहुत-सा धन भी मिल जाए, तो भी मैं उसकी इच्छा नहीं करता।"
 
The king said, "Brahmin! I do not wish to live by resorting to deceit and arrogance. Even if I get a lot of wealth by the help of unrighteousness, I do not desire it." 1.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)