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mahabharat 12.105.5-6h: ऋषि बोले - हे राजन! अहंकार, काम, क्रोध, हर्ष और भय को त्यागकर हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर शत्रुओं की भी सेवा करो।   |   mahabharat अध्याय 12.105: कालकवृक्षीय मुनिके द्वारा गये हुए राज्यकी प्राप्तिके लिये विभिन्न उपायोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.105.5-6h 
मुनिरुवाच
हित्वा दम्भं च कामं च क्रोधं हर्षं भयं तथा॥ ५॥
अप्यमित्राणि सेवस्व प्रणिपत्य कृताञ्जलि:।
 
 
अनुवाद
ऋषि बोले - हे राजन! अहंकार, काम, क्रोध, हर्ष और भय को त्यागकर हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर शत्रुओं की भी सेवा करो।
 
The sage said - O King! Giving up arrogance, lust, anger, joy and fear, serve even your enemies with folded hands and bowed head. 5 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)