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mahabharat 12.105.22: इसमें संदेह नहीं कि भाग्य के मारे मनुष्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यदि संभव हो तो अपने शत्रु को विश्वजित नामक यज्ञ में लगाकर उससे सर्वस्व दक्षिणा कराकर उसे दरिद्र बना दो।   |   mahabharat अध्याय 12.105: कालकवृक्षीय मुनिके द्वारा गये हुए राज्यकी प्राप्तिके लिये विभिन्न उपायोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.105.22 
असंशयं दैवपर: क्षिप्रमेव विनश्यति।
याजयैनं विश्वजिता सर्वस्वेन वियुज्य तम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
इसमें संदेह नहीं कि भाग्य के मारे मनुष्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यदि संभव हो तो अपने शत्रु को विश्वजित नामक यज्ञ में लगाकर उससे सर्वस्व दक्षिणा कराकर उसे दरिद्र बना दो।
 
There is no doubt that a man struck by destiny is soon destroyed. If possible, engage your enemy in a sacrifice called Vishwajit and make him poor by making him donate everything as dakshina.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)