अध्याय 105: कालकवृक्षीय मुनिके द्वारा गये हुए राज्यकी प्राप्तिके लिये विभिन्न उपायोंका वर्णन
श्लोक 1: ऋषि बोले - राजकुमार! यदि तुम अपने में कुछ बल देखते हो तो मैं तुम्हें राज्य प्राप्ति का उपाय बताता हूँ॥1॥
श्लोक 2: यदि तुम उसे आचरण में ला सको और उसके अनुसार सब कुछ कर सको, तो मैं उस नीति का यथार्थ रूप में वर्णन करूँगा। तुम उसे पूरा सुनो॥ 2॥
श्लोक 3-4h: यदि तुम मेरी बताई हुई नीति के अनुसार आचरण करोगे, तो तुम्हें पुनः महान वैभव, राज्य, राज्य-सुख और अपार धन की प्राप्ति होगी। राजन! यदि मेरी बात तुम्हें अच्छी लगे, तो फिर कहो, क्या मैं तुम्हें यह बात समझाऊँ?॥3 1/2॥
श्लोक 4-5h: राजा ने कहा, "प्रभु! आप ही वह नीति समझाइए। मैं आपकी शरण में आया हूँ। आज आपसे मेरी जो भेंट हुई है, वह व्यर्थ नहीं जानी चाहिए।"
श्लोक 5-6h: ऋषि बोले - हे राजन! अहंकार, काम, क्रोध, हर्ष और भय को त्यागकर हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर शत्रुओं की भी सेवा करो।
श्लोक 6-7: अपने पवित्र आचरण और अच्छे कर्मों से तुम्हें विदेहराज का विश्वास अवश्य प्राप्त करना चाहिए। विदेहराज सत्यवादी हैं, इसलिए वे तुम्हें अवश्य धन देंगे। यदि ऐसा हुआ, तो तुम सभी प्राणियों के विश्वास के स्रोत और राजा के दाहिने हाथ बन जाओगे। 6-7.
श्लोक 8-9h: तब तुम्हें बहुत से शुद्ध हृदय वाले, विकारों से रहित और उत्साही सहायक मिलेंगे। जो मनुष्य शास्त्रानुसार आचरण करता है और अपने मन और इंद्रियों को वश में रखता है, वह न केवल अपना उद्धार करता है, अपितु अपनी प्रजा को भी सुखी बनाता है। 8 1/2
श्लोक 9-11h: राजा जनक बड़े धैर्यवान और धनवान हैं। जब वे तुम्हारा स्वागत करेंगे, तब तुम सबके विश्वासपात्र होगे और तुम्हें बड़ा गर्व होगा। ऐसी स्थिति में, मित्रों की सेना इकट्ठी करके और अच्छे मंत्रियों से सलाह लेकर, अपने बन्धु-बान्धवों द्वारा शत्रु सेना में फूट डालो और बेल से ही बेल को तोड़ डालो (शत्रु की सहायता से ही शत्रु का नाश करो)।॥9-10 1/2॥
श्लोक 11-13: अथवा दूसरों के साथ मिलकर उनकी सहायता से शत्रु का बल नष्ट कर दो। राजकुमार! शत्रु को उन शुभ वस्तुओं में आसक्त करो जो अप्राप्य हैं, जैसे स्त्रियाँ, सुंदर वस्त्र, उत्तम शय्या, आसन, वाहन, बहुमूल्य भवन, नाना प्रकार के रस, सुगंध और फल। शत्रु के मन में नाना प्रकार के पक्षी और नाना प्रकार के पशु-पक्षियों के प्रति आसक्ति उत्पन्न करो, जिससे शत्रु धीरे-धीरे दरिद्र होकर स्वयं ही नष्ट हो जाए।
श्लोक 14: यदि ऐसा करते समय शत्रु को उस व्यसन में लिप्त होने से रोकने या मना करने की आवश्यकता हो, तो वैसा ही करना चाहिए; अथवा यदि वह उपेक्षा करने योग्य हो, तो उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिए; परंतु जो राजा उत्तम नीति का फल चाहता है, उसे किसी भी स्थिति में अपने गुप्त मन्त्र शत्रु पर प्रकट नहीं करने चाहिए ॥14॥
श्लोक 15: बुद्धिमानों के विश्वास का पात्र बनकर तुम्हें अपने परम शत्रु के राज्य में सुखपूर्वक विचरण करना चाहिए तथा कुत्ते, मृग और कौए के समान सतर्क रहकर व्यर्थ आचरण करके विदेहराज के प्रति मित्रता का कर्तव्य निभाना चाहिए।
श्लोक 16: शत्रु को ऐसे बड़े-बड़े कार्य करने के लिए प्रेरित करो कि उन्हें पूरा करना अत्यंत कठिन हो जाए। तथा शक्तिशाली राजाओं की सहायता से शत्रु का ऐसा विरोध करो कि उसे पार करना विशाल नदी के समान कठिन हो जाए ॥16॥
श्लोक 17: बड़े-बड़े बगीचे लगाओ, उसे महंगे बिस्तरों, बिछावनों और अन्य विलासिता की वस्तुओं पर खर्च करने को मजबूर करो और उसका पूरा खजाना खाली कर दो। 17.
श्लोक 18: मिथिला के प्रसिद्ध ब्राह्मणों की स्तुति करो और उनसे विदेहराज को बड़े-बड़े यज्ञ और दान देने की सलाह दिलवाओ। वे ब्राह्मण सदैव तुम्हारा उपकार करेंगे और विदेहराज को भेड़ियों की तरह फाड़ डालेंगे।॥18॥
श्लोक 19: इसमें कोई संदेह नहीं कि पुण्यात्मा पुरुष परम गति को प्राप्त होता है। वह स्वर्ग में परम पवित्र स्थान को प्राप्त करता है। 19॥
श्लोक 20: हे कोसलराज! जो राजा धर्म या अधर्म अथवा दोनों में लिप्त रहता है, उसका कोष अवश्य ही रिक्त हो जाता है। जैसे ही कोष रिक्त होता है, राजा अपने शत्रुओं के हाथों में पड़ जाता है।
श्लोक 21: शत्रु के राज्य के सभी फल, मूल और फसलों को गुप्त रूप से नष्ट कर दो। इससे उसके शत्रु प्रसन्न होंगे। यह मत कहो कि यह कार्य किसी मनुष्य ने किया है। इसे एक दैवीय घटना कहो।
श्लोक 22: इसमें संदेह नहीं कि भाग्य के मारे मनुष्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। यदि संभव हो तो अपने शत्रु को विश्वजित नामक यज्ञ में लगाकर उससे सर्वस्व दक्षिणा कराकर उसे दरिद्र बना दो।
श्लोक 23-24: इससे तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी। तत्पश्चात् तुम राजा को किसी दुःखी महात्मा की व्यथा और किसी योगधर्म के ज्ञाता पुण्यात्मा पुरुष की कीर्ति सुनाओ, जिससे शत्रु राजा राज्य त्यागने की इच्छा करे। यदि सम्भवतः वह स्वभाव में ही रहे और त्याग से प्रभावित न हो, तो उसके द्वारा नियुक्त पुरुषों द्वारा समस्त शत्रुओं का नाश करने वाली सिद्ध औषधि का प्रयोग करके शत्रु के हाथी, घोड़े और मनुष्यों को मार डालना चाहिए। 23-24॥
श्लोक 25: राजकुमार! यदि मन को वश में रखने वाला मनुष्य धर्म के विरुद्ध कार्य करने में समर्थ हो, तो उसके द्वारा ये तथा अन्य अनेक सुनियोजित छल-प्रयोग किये जा सकते हैं॥ 25॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥