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mahabharat 12.104.d5: दूसरों के कष्ट देखकर मूर्ख को संतुष्टि मिलती है। वह सोचता है कि वह उस कष्ट में नहीं है। इसी भेदभाव के कारण उसे कभी शांति नहीं मिलती।   |   mahabharat अध्याय 12.104: राज्य, खजाना और सेना आदिसे वंचित हुए असहाय क्षेमदर्शी राजाके प्रति कालकवृक्षीय मुनिका वैराग्यपूर्ण उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.104.d5 
(अन्यत्रोपनता ह्यापत् पुरुषं तोषयत्युत।
तेन शान्तिं न लभते नाहमेवेति कारणात्॥ )
 
 
अनुवाद
दूसरों के कष्ट देखकर मूर्ख को संतुष्टि मिलती है। वह सोचता है कि वह उस कष्ट में नहीं है। इसी भेदभाव के कारण उसे कभी शांति नहीं मिलती।
 
The troubles faced by others give satisfaction to a fool. He thinks that he is not in that trouble. Due to this discrimination he never gets peace.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)